याद है वह दिन
जब घने जंगल में
वो अकेली थी
भिक्षा के बहाने
वो सामने आया
किंतु हेतू उसका
छिप नहीं पाया
देखकर उसका
सुंदर रुप
मन ही मन
वो ललचाया,
बुलाके उसको
रेखा के पार
हरण उसने
सहज कर लिया
सोच रहा था
पाना था वह
पा ही लिया,
आकाश मार्ग से
उड़ जाऊंगा
अब क्या कोई
रोक सकेगा?
अहंकार उसका
चूर हुआ जब
पंछी उसपर
झपटा था
इतनी-सी ताकत
थी उसकी
पर अंत तक
वह लढा था
आज भी रावण
रोज आता है
दुष्टसी बातें
करता है
भाषण उसका
सुनके पूरा
आज भी मस्तक
झुकता है
कोने में बैठी
उदास सीता
भयभीत हो
जाती है
डर न उसे रावणका
किंतु खेद है उस बात का
सुननेवालों में एक भी
जटायू ना होने का
श्रीकुल
५ /९/२०१८
जब घने जंगल में
वो अकेली थी
भिक्षा के बहाने
वो सामने आया
किंतु हेतू उसका
छिप नहीं पाया
देखकर उसका
सुंदर रुप
मन ही मन
वो ललचाया,
बुलाके उसको
रेखा के पार
हरण उसने
सहज कर लिया
सोच रहा था
पाना था वह
पा ही लिया,
आकाश मार्ग से
उड़ जाऊंगा
अब क्या कोई
रोक सकेगा?
अहंकार उसका
चूर हुआ जब
पंछी उसपर
झपटा था
इतनी-सी ताकत
थी उसकी
पर अंत तक
वह लढा था
आज भी रावण
रोज आता है
दुष्टसी बातें
करता है
भाषण उसका
सुनके पूरा
आज भी मस्तक
झुकता है
कोने में बैठी
उदास सीता
भयभीत हो
जाती है
डर न उसे रावणका
किंतु खेद है उस बात का
सुननेवालों में एक भी
जटायू ना होने का
श्रीकुल
५ /९/२०१८